।।16.1।।

श्री भगवानुवाच अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।16.1।।

śhrī-bhagavān uvācha abhayaṁ sattva-sanśhuddhir jñāna-yoga-vyavasthitiḥ dānaṁ damaśh cha yajñaśh cha svādhyāyas tapa ārjavam

śhrī-bhagavān uvācha—the Supreme Divine Personality said; abhayam—fearlessness; sattva-sanśhuddhiḥ—purity of mind; jñāna—knowledge; yoga—spiritual; vyavasthitiḥ—steadfastness; dānam—charity; damaḥ—control of the senses; cha—and; yajñaḥ—performance of sacrifice; cha—and; svādhyāyaḥ—study of sacred books; tapaḥ—austerity; ārjavam—straightforwardness;

अनुवाद

।।16.1।।श्रीभगवान् बोले -- भयका सर्वथा अभाव; अन्तःकरणकी शुद्धि; ज्ञानके लिये योगमें दृढ़ स्थिति; सात्त्विक दान; इन्द्रियोंका दमन; यज्ञ; स्वाध्याय; कर्तव्य-पालनके लिये कष्ट सहना; शरीर-मन-वाणीकी सरलता।

टीका

।।16.1।। व्याख्या--[पंद्रहवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि 'जो मुझे पुरुषोत्तम जान लेता है, वह सब प्रकारसे मेरा ही भजन करता है अर्थात् वह मेरा अनन्य भक्त हो जाता है। इस प्रकार एकमात्र भगवान्का उद्देश्य होनेपर साधकमें दैवी-सम्पत्ति स्वतः प्रकट होने लग जाती है। अतः भगवान् पहले तीन श्लोकोंमें क्रमशः भाव, आचरण और प्रभावको लेकर दैवी-सम्पत्तिका वर्णन करते हैं।] अभयम् (टिप्पणी प0 790.1)--अनिष्टकी

आशङ्कासे मनुष्यके भीतर जो घबराहट होती है, उसका नाम भय है और उस भयके सर्वथा अभावका नाम 'अभय' है। भय दो रीतिसे होता है--(1) बाहरसे और (2) भीतरसे। (1) बाहरसे आनेवाला भय--(क) चोर, डाकू, व्याघ्र, सर्प आदि प्राणियोंसे जो भय होता है, वह बाहरका भय है। यह भय शरीरनाशकी आशङ्कासे ही होता है। परन्तु जब यह अनुभव हो जाता है कि यह शरीर नाशवान् है और जानेवाला ही है, तो फिर भय नहीं रहता।   बीड़ीसिगरेट, अफीम, भाँग,

शराब आदिके व्यसनोंको छो़ड़नेका एवं व्यसनी मित्रोंसे अपनी मित्रता टूटनेका जो भय होता है, वह मनुष्यकी अपनी कायरतासे ही होता है। कायरता छोड़नेसे यह भाव नहीं रहता।   (ख) अपने वर्ण, आश्रम आदिके अनुसार कर्तव्यपालन करते हुए उसमें भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध कोई काम न हो जाय हमें विद्या पढ़ानेवाले, अच्छी शिक्षा देनेवाले आचार्य, गुरु, सन्तमहात्मा, मातापिता आदिके वचनोंकी आज्ञाकी अवहेलना न हो जाय हमारे द्वारा

शास्त्र और कुलमर्यादाके विरुद्ध कोई आचरण न बन जाय -- इस प्रकारका भय भी बाहरी भय कहलाता है। परन्तु यह भय वास्तवमें भय नहीं है, प्रत्युत यह तो अभय बनानेवाला भय है। ऐसा भय तो साधकके जीवनमें होना ही चाहिये। ऐसा भय होनेसे ही वह अपने मार्गपर ठीक तरहसे चल सकता है। कहा भी है --  हरिडर, गुरुडर, जगतडर, डर करनी में सार। रज्जब डर्या सो ऊबर्या, गाफिल खायी मार।। (2) भीतरसे पैदा होनेवाला भय--(क) मनुष्य जब पाप,

अन्याय, अत्याचार आदि निषिद्ध आचरण करना चाहता है, तब (उनको करनेकी भावना मनमें आते ही) भीतरसे भय पैदा होता है। मनुष्य निषिद्ध आचरण तभीतक करता है, जबतक उसके मनमें मेरा शरीर बना रहे, मेरा मानसम्मान होता रहे, मेरेको सांसारिक भोगपदार्थ मिलते रहें, इस प्रकार सांसारिक जड वस्तुओंकी प्राप्तिका और उनकी रक्षाका उद्देश्य रहता है (टिप्पणी प0 790.2)। परन्तु जब मनुष्यका एकमात्र उद्देश्य चिन्मयतत्त्वको प्राप्त करनेका

हो जाता है (टिप्पणी प0 791.1), तब उसके द्वारा अन्याय, दुराचार छूट जाते हैं और वह सर्वथा अभय हो जाता है। कारण कि उसके लक्ष्य परमात्मतत्त्वमें कभी कमी नहीं आती और वह कभी नष्ट नहीं होता।   (ख) जब मनुष्यके आचरण ठीक नहीं होते और वह अन्याय, अत्याचार आदिमें लगा रहता है, तब उसको भय लगता है। जैसे, रावणसे मनुष्य, देवता, यक्ष, राक्षस आदि सभी डरते थे, पर वही रावण जब सीताका हरण करनेके लिये जाता है, तब वह डरता

है। ऐसे ही कौरवोंकी अठारह अक्षौहिणी सेनाके बाजे बजे, तो उसका पाण्डवसेनापर कुछ भी असर नहीं हुआ (गीता 1। 13), पर जब पाण्डवोंकी सात अक्षौहिणी सेनाके बाजे बजे, तब कौरवसेनाके हृदय विदीर्ण हो गये (1। 19)। तात्पर्य यह है कि अन्याय, अत्याचार करनेवालोंके हृदय कमजोर हो जाते है, इसलिये वे भयभीत होते हैं। जब मनुष्य अन्याय आदिको छोड़कर अपने आचरणों एवं भावोंको शुद्ध बनाता है, तब उसका भय मिट जाता है।   (ग) मनुष्यशरीर

प्राप्त करके यह जीव जबतक करनेयोग्यको नहीं करता, जाननेयोग्यको नहीं जानता और पानेयोग्यको नहीं पाता? तबतक वह सर्वथा अभय नहीं हो सकता उसके जीवनमें भय रहता ही है। भगवान्की तरफ चलनेवाला साधक भगवान्पर जितनाजितना अधिक विश्वास करता है और उनके आश्रित होता है? उतनाहीउतना वह अभय होता चला जाता है। उसमें स्वतः यह विचार आता है कि मैं तो परमात्माका अंश हूँ अतः कभी नष्ट होनेवाला नहीं हूँ, तो फिर भय किस बातका (टिप्पणी

प0 791.2) और संसारके अंश शरीर आदि सब पदार्थ प्रतिक्षण नष्ट हो रहे हैं, तो फिर भय किस बातका ऐसा विवेक स्पष्टरूपसे प्रकट होनेपर भय स्वतः नष्ट हो जाता है और साधक सर्वथा अभय हो जाता है।   भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़नेपर, भगवान्को ही अपना माननेपर शरीर, कुटुम्ब आदिमें ममता नहीं रहती। ममता न रहनेसे मरनेका भय नहीं रहता और साधक अभय हो जाता है।   'सत्त्वसंशुद्धिः'-- अन्तःकरणकी सम्यक् शुद्धिको सत्त्वसंशुद्धि

कहते हैं। सम्यक् शुद्धि क्या है संसारसे रागरहित होकर भगवान्में अनुराग हो जाना ही अन्तःकरणकी सम्यक् शुद्धि है। जब अपना विचार, भाव, उद्देश्य, लक्ष्य केवल एक परमात्माकी प्राप्तिका हो जाता है, तब अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है। कारण कि नाशवान् वस्तुओंकी प्राप्तिका उद्देश्य होनेसे ही अन्तःकरणमें मल, विक्षेप और आवरण -- ये तीन तरहके दोष आते हैं। शास्त्रोंमें मलदोषको दूर करनेके लिये निष्कामभावसे कर्म (सेवा), विक्षेपदोषको

दूर करनेके लिये उपासना और आवरणदोषको दूर करनेके लिये ज्ञान बताया है। यह होनेपर भी अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये सबसे बढ़िया उपाय है -- अन्तःकरणको अपना न मानना।   साधकको पुराने पापको दूर करनेके लिये या किसी परिस्थितिके वशीभूत होकर किये गये नये पापको दूर करनेके लिये अन्य प्रायश्चित्त करनेकी उतनी आवश्यकता नहीं है। उसको तो चाहिये कि वह जो साधन कर रहा है, उसीमें उत्साह और तत्परतापूर्वक लगा रहे। फिर उसके ज्ञातअज्ञात

सब पाप दूर हो जायँगे और अन्तःकरण स्वतः शुद्ध हो जायगा।   साधकमें ऐसी एक भावना बन जाती है कि साधनभजन करना अलग काम है और व्यापारधंधा आदि करना अलग काम है अर्थात् ये दोनों अलगअलग विभाग हैं। इसलिये व्यापार आदि व्यवहारमें झूठकपट आदि तो करने ही पड़ते हैं -- ऐसी जो छूट ली जाती है? उससे अन्तःकरण बहुत ही अशुद्ध होता है। साधनके साथसाथ जो असाधन होता रहता है, उससे साधनमें जल्दी उन्नति नहीं होती। इसलिये साधकको

सदा सावधान रहना चाहिये अर्थात् नये पाप कभी न बने -- ऐसी सावधानी सदासर्वदा बनी रहनी चाहिये।   साधक भूलसे किये हुए दुष्कर्मोंके अनुसार अपनेको दोषी मान लेता है और अपना बुरा करनेवाले व्यक्तिको भी दोषी मान लेता है, जिससे उसका अन्तःकरण अशुद्ध हो जाता है। उस अशुद्धिको मिटानेके लिये साधकको चाहिये कि वह भूलसे किये हुए दुष्कर्मको पुनः कभी न करनेका दृढ़ व्रत ले ले तथा अपना बुरा करनेवाले व्यक्तिके अपराधको क्षमा

माँगे बिना ही क्षमा कर दे और भगवान्से प्रार्थना करे कि हे नाथ मेरा जो कुछ बुरा हुआ है, वह तो मेरे दुष्कर्मोंका ही फल है। वह बेचारा तो मुफ्तमें ही ऐसा कर बैठा है। उसका इसमें कोई दोष नहीं है। आप उसे क्षमा कर दें। ऐसा करनेसे अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है।   'ज्ञानयोगव्यवस्थितिः'-- ज्ञानके लिये योगमें स्थित होना अर्थात् परमात्मतत्त्वका जो ज्ञान (बोध) है, वह चाहे सगुणका हो या निर्गुणका, उस ज्ञानके लिये योगमें

स्थित होना आवश्यक है। योगका अर्थ है -- सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्तिअप्राप्तिमें, मानअपमानमें, निन्दास्तुतिमें, रोगनीरोगतामें सम रहना अर्थात् अन्तःकरणमें हर्षशोकादि न होकर निर्विकार रहना। 'दानम्'-- लोकदृष्टिमें जिन वस्तुओंको अपना माना जाता है, उन वस्तुओंको सत्पात्रका तथा देश, काल, परिस्थिति आदिका विचार रखते हुए आवश्यकतानुसार दूसरोंको वितीर्ण कर देना दान है। दान कई तरहके होते हैं जैसे भूमिदान, गोदान,

स्वर्णदान, अन्नदान, वस्त्रदान आदि। इन सबमें अन्नदान प्रधान है। परन्तु इससे भी अभयदान प्रधान (श्रेष्ठ) है (टिप्पणी प0 792.1)। उस अभयदानके दो भेद होते हैं --,   (1) संसारकी आफतसे, विघ्नोंसे, परिस्थितियोंसे भयभीत हुएको अपनी शक्ति, सामर्थ्यके अनुसार भयरहित करना, उसे आश्वासन देना, उसकी सहायता करना। यह अभयदान उसके शरीरादि सांसारिक पदार्थोंको लेकर होता है। (2) संसारमें फँसे हुए व्यक्तिको जन्ममरणसे रहित

करनेके लिये भगवान्की कथा आदि सुनाना (टिप्पणी प0 792.2)। गीता, रामायण, भागवत आदि ग्रन्थोंको एवं उनके भावोंको सरलभाषामें छपवाकर सस्ते दामोंमें लोगोंको देना अथवा कोई समझना चाहे तो उसको समझाना, जिससे उसका कल्याण हो जाय। ऐसे दानसे भगवान् बहुत राजी होते हैं (गीता 18। 68 -- 69) क्योंकि भगवान् ही सबमें परिपूर्ण हैं। अतः जितने अधिक जीवोंका कल्याण होता है, उतने ही अधिक भगवान् प्रसन्न होते हैं। यह सर्वश्रेष्ठ

अभयदान है। इसमें भी भगवत्सम्बन्धी बातें दूसरोंको सुनाते समय साधक वक्ताको यह सावधानी रखनी चाहिये कि वह दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विशेषता न माने, प्रत्युत इसमें भगवान्की कृपा माने कि भगवान् ही श्रोताओंके रूपमें आकर मेरा समय सार्थक कर रहे हैं।   ऊपर जितने दान बताये हैं, उनके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़कर साधक ऐसा माने कि अपने पास वस्तु, सामर्थ्य, योग्यता आदि जो कुछ भी है, वह सब भगवान्ने दूसरोंके सेवा करनेके

लिये मुझे निमित्त बनाकर दी है। अतः भगवत्प्रीत्यर्थ आवश्यकतानुसार जिसकिसीको जो कुछ दिया जाय, वह सब उसीका समझकर उसे देना दान है।   'दमः'-- इन्द्रियोंको पूरी तरह वशमें करनेका नाम दम है। तात्पर्य यह है कि इन्द्रियाँ, अन्तःकरण और शरीरसे कोई भी प्रवृत्ति शास्त्रनिषिद्ध नहीं होनी चाहिये। शास्त्रविहित प्रवृत्ति भी अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितके लिये ही होनी चाहिये। इस प्रकारकी प्रवृत्तिसे

इन्द्रियलोलुपता, आसक्ति और पराधीनता नहीं रहती एवं शरीर और इन्द्रियोंके बर्ताव शुद्ध, निर्मल होते हैं।   साधकका उद्देश्य इन्द्रियोंके दमनका होनेसे अकर्तव्यमें तो उसकी प्रवृत्ति होती ही नहीं और कर्तव्यमें स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है, तो उसमें स्वार्थ, अभिमान आसक्ति, कामना आदि दोष नहीं रहते। यदि कभी किसी कार्यमें स्वार्थभाव आ भी जाता है, तो वह उसका दमन करता चला जाता है, जिससे अशुद्धि मिटती जाती है और

शुद्धि होती चली जाती है और आगे चलकर उसका दम अर्थात् इन्द्रियसंयम सिद्ध हो जाता है।   'यज्ञः'-- यज्ञ शब्दका अर्थ आहुति देना होता है। अतः अपने वर्णाश्रमके अनुसार होम, बलिवैश्वदेव आदि करना यज्ञ है। इसके सिवाय गीताकी दृष्टिसे अपने वर्ण, आश्रम, परिस्थिति आदिके अनुसार जिसकिसी समय जो कर्तव्य प्राप्त हो जाय, उसको स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके दूसरोंके हितकी,भावनासे या भगवत्प्रीत्यर्थ करना यज्ञ है। इसके

अतिरिक्त जीविकासम्बन्धी व्यापार, खेती आदि तथा शरीरनिर्वाहसम्बन्धी खानापीना, चलनाफिरना, सोनाजागना, देनालेना आदि सभी क्रियाएँ भगवत्प्रीत्यर्थ करना यज्ञ है। ऐसे ही मातापिता, आचार्य, गुरुजन आदिकी आज्ञाका पालन करना, उनकी सेवा करना, उनको मन, वाणी, तन और धनसे सुख पहुँचाकर उनकी प्रसन्नता प्राप्त करना और गौ, ब्राह्मण, देवता, परमात्मा आदिका पूजन करना, सत्कार करना -- ये सभी यज्ञ हैं।   'स्वाध्यायः' -- अपने

ध्येयकी सिद्धिके लिये भगवन्नामका जप और गीता, भागवत, रामायण, महाभारत आदिके पठनपाठनका नाम स्वाध्याय है। वास्तवमें तो 'स्वस्य अध्यायः (अध्ययनम्) स्वाध्यायः' के अनुसार अपनी वृत्तियोंका, अपनी स्थितिका ठीक तरहसे अध्ययन करना ही स्वाध्याय है। इसमें भी साधकको न तो अपनी वृत्तियोंसे अपनी स्थितिकी कसौटी लगानी है और न वृत्तियोंके अधीन अपनी स्थिति ही माननी है। कारण कि वृत्तियाँ तो हरदम आतीजाती रहती हैं, बदलती रहती

हैं। तो फिर स्वाभाविक यह प्रश्न उठता है कि क्या हम अपनी वृत्तियोंको शुद्ध न करें वास्तवमें तो साधकका कर्तव्य वृत्तियोंको शुद्ध करनेका ही होना चाहिये और वह शुद्धि अन्तःकरण तथा उसकी वृत्तियोंको अपना न माननेसे बहुत जल्दी हो जाती है क्योंकि उनको अपना मानना ही मूल अशुद्धि है। साक्षात् परमात्माका अंश होनेसे अपना स्वरूप कभी अशुद्ध हुआ ही नहीं। केवल वृत्तियोंके अशुद्ध होनेसे ही उसका यथार्थ अनुभव नहीं होता। 'तपः'

-- भूखप्यास, सरदीगरमी, वर्षा आदि सहना भी एक तप है, पर इस तपमें भूखप्यास आदिको जानकर सहते हैं। वास्तवमें साधन करते हुए अथवा जीवननिर्वाह करते हुए देश, काल, परिस्थिति आदिको लेकर जो कष्ट, आफत, विघ्न आदि आते हैं, उनको प्रसन्नतापूर्वक सहना ही तप है (टिप्पणी प0 793.1) क्योंकि इस तपमें पहले किये गये पापोंका नाश होता है औह सहनेवालेमें सहनेकी एक नयी शक्ति, एक नया बल आता है।   साधकको सावधान रहना चाहिये कि

वह उस तपोबलका प्रयोग दूसरोंको वरदान देनेमें, शाप देने या अनिष्ट करनेमें तथा अपनी इच्छापूर्ति करनेमें न लगाये, प्रत्युत उस बलको अपने साधनमें जो बाधाएँ आती हैं, उनको प्रसन्नतासे सहनेकी शक्ति बढ़ानेमें ही लगाये।   साधक जब साधन करता है, तब वह साधनमें कई तरहसे विघ्न मानता है। वह समझता है कि मुझे एकान्त मिले तो मैं साधन कर सकता हूँ, वायुमण्डल अच्छा हो तो साधन कर सकता हूँ इत्यादि। इन सब अनुकूलताओंकी चाहना

न करना अर्थात् उनके अधीन न होना भी तप है। साधकको अपना साधन परिस्थितियोंके अधीन नहीं मानना चाहिये, प्रत्युत परिस्थितिके अनुसार अपना साधन बना लेना चाहिये। साधकको अपनी चेष्टा तो एकान्तमें साधन करनेकी करनी चाहिये, पर एकान्त न मिले तो मिली हुई परिस्थितिको भगवान्की भेजी हुई समझकर विशेष उत्साहसे प्रसन्नतापूर्वक साधनमें प्रवृत्ति होना चाहिये।   'आर्जवम्'-- सरलता, सीधेपनको आर्जव कहते हैं। यह सरलता साधकका

विशेष गुण है। यदि साधक यह चाहता है कि दूसरे लोग मुझे अच्छा समझें, मेरा व्यवहार ठीक नहीं होगा तो लोग मुझे बढ़िया नहीं मानेंगे, इसलिये मुझे सरलतासे रहना चाहिये, तो यह एक प्रकारका कपट ही है। इसमें साधकमें बनावटीपन आता है, जब कि साधकमें सीधा, सरल भाव होना चाहिये। सीधा, सरल होनेके कारण लोग उसको मूर्ख, बेसमझ कह सकते हैं, पर उससे साधककी कोई हानि नहीं है। अपने उद्धारके लिये तो सरलता बड़े कामकी चीज है --    'कपट गाँठ मन में नहीं, सबसों सरल सुभाव।'