।।18.12।।

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्।भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्।।18.12।।

aniṣhṭam iṣhṭaṁ miśhraṁ cha tri-vidhaṁ karmaṇaḥ phalam bhavaty atyāgināṁ pretya na tu sannyāsināṁ kvachit

aniṣhṭam—unpleasant; iṣhṭam—pleasant; miśhram—mixed; cha—and; tri-vidham—three-fold; karmaṇaḥ phalam—fruits of actions; bhavati—accrue; atyāginām—to those who are attached to persona reward; pretya—after death; na—not; tu—but; sanyāsinām—for the renouncers of actions; kvachit—ever

अनुवाद

।।18.12।।कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको कर्मोंका इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित -- ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके बाद भी होता है; परन्तु कर्मफलका त्याग करनेवालोंको कहीं भी नहीं होता।

टीका

।।18.12।। व्याख्या --   अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् -- कर्मका फल तीन तरहका होता है -- इष्ट? अनिष्ट और मिश्र। जिस परिस्थितिको मनुष्य चाहता है? वह इष्ट कर्मफल है? जिस परिस्थितिको मनुष्य नहीं चाहता? वह अनिष्ट कर्मफल है और जिसमें कुछ भाग इष्टका तथा कुछ भाग अनिष्टका है? वह मिश्र कर्मफल है। वास्तवमें देखा जाय तो संसारमें प्रायः मिश्रित ही फल होता है जैसे -- धन होनेसे अनुकूल (इष्ट) और प्रतिकूल

(अनिष्ट) -- दोनों ही परिस्थितियाँ आती हैं धनसे निर्वाह होता है -- यह अनुकूलता है और टैक्स लगता है? धन नष्ट हो जाता है? छिन जाता है -- यह प्रतिकूलता है। तात्पर्य है कि इष्टमें भी आंशिक अनिष्ट और अनिष्टमें भी आंशिक इष्ट रहता ही है। कारण कि सम्पूर्ण संसार त्रिगुणात्मक है (गीता 18। 40) यह जन्म भी दुःखालय (8। 15) और सुखरहित (9। 33)। अतः चाहे इष्ट (अनुकूल) परिस्थिति हो? चाहे अनिष्ट (प्रतिकूल) परिस्थिति

हो? वह सर्वथा अनुकूल या प्रतिकूल होती ही नहीं। यहाँ इष्ट और अनिष्ट कहनेका मतलब यह है कि इष्टमें अनुकूलताकी और अनिष्टमें प्रतिकूलताकी प्रधानता होती है। वास्तवमें कर्मोंका फल मिश्रित ही होता है क्योंकि कोई भी कर्म सर्वथा निर्दोष नहीं होता (18। 48)।भवत्यत्यागिनां प्रेत्य -- उपर्युक्त सभी फल अत्यागियोंको अर्थात् फलकी इच्छा रखकर कर्म करनेवालोंको ही मिलते हैं? संन्यासियोंको नहीं। कारण कि जितने भी कर्म

होते हैं? वे सब प्रकृतिके द्वारा अर्थात् प्रकृतिके कार्य शरीर? इन्द्रियाँ? मन और बुद्धिके द्वारा ही होते हैं तथा फलरूप परिस्थिति भी प्रकृतिके द्वारा ही बनती है।,इसलिये कर्मोंका और उनके फलोंका सम्बन्ध केवल प्रकृतिके साथ है? स्वयं(चेतन स्वरूप) के साथ नहीं। परन्तु जब स्वयं उनसे सम्बन्ध तोड़ लेता है? तो फिर वह भोगी नहीं बनता? प्रत्युत त्यागी हो जाता है।अत्यागीका मतलब है -- पीछेके दो (दसवेंग्यारहवें) श्लोकोंमें

जिन त्यागियोंकी बात आयी है? उनके समान जो त्यागी नहीं है अर्थात् जिन्होंने कर्मफलका त्याग नहीं किया है? ऐसे अत्यागी मनुष्योंके सामने इष्ट? अनिष्ट और मिश्र -- तीनों कर्मफल अनुकल या प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें आते रहते हैं? जिनसे वे सुखीदुःखी होते रहते हैं। उनसे सुखीदुःखी होना ही वास्तवमें बन्धन है।वास्तवमें अनुकूलतासे सुखी होना ही प्रतिकूलतामें दुःखी होनेका कारण है क्योंकि परिस्थितिजन्य सुख भोगनेवाला

कभी दुःखसे बच ही नहीं सकता। जबतक वह सुख भोगता रहेगा? तबतक वह प्रतिकूल परिस्थितियोंमें दुःखी होता ही रहेगा। चिन्ता? शोक? भय? उद्वेग आदि उसको कभी छोड़ नहीं सकते और वह भी इनसे कभी छूट नहीं सकता।प्रेत्य भवति कहनेका तात्पर्य है कि जो कर्मफलके त्यागी नहीं हैं? उनको इष्ट? अनिष्ट और मिश्र -- ये तीनों कर्मफल मरनेके बाद जरूर मिलते हैं। परन्तु इसके साथ न तु संन्यासिनां क्वचित् पदोंमें कहा गया है कि जो कर्मफलके

त्यागी हैं? उनको कहीं भी अर्थात् यहाँ और मरनेके बाद भी कर्मफल नहीं मिलता। इससे सिद्ध होता है कि अत्यागियोंको मरनेके बाद तो कर्मफल मिलता ही है? पर यहाँ जीतेजी भी कर्मफल मिल सकता है।न तु संन्यासिनां क्वचित् -- संन्यासियों(त्यागियों) को कहीं भी अर्थात् इस लोकमें या परलोकमें? इस जन्ममें या मरनेके बाद भी कर्मफल भोगना नहीं पड़ता। हाँ? पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके अनुसार इस जन्ममें उनके सामने अनुकूल या

प्रतिकूल परिस्थिति तो आती है? पर वे अपने विवेकके बलसे उन परिस्थितियोंके भोगी नहीं बनते? उनसे सुखीदुःखी नहीं होते अर्थात् सर्वथा निर्लिप्त रहते हैं।संन्यासियों अर्थात् त्यागियोंको फल क्यों नहीं भोगना पड़ता कारण कि वे अपने लिये कुछ भी नहीं करते। उनको अच्छी तरहसे यह विवेक हो जाता है कि अपना जो सत्स्वरूप है? उसके लिये किसी भी क्रिया और वस्तुकी आवश्यकता है ही नहीं। अपने लिये पानेकी इच्छासे साधक कुछ भी

करता है तो वह अपने व्यक्तित्वको ही स्थिर रखता है क्योंकि वह संसारमात्रके हितसे अपना हित अलग मानता है। जब वह संसारमात्रके हितसे अपना हित अलग नहीं मानता अर्थात् सबके हितमें ही अपना हित मानता है? तब वह स्वतः सर्वभूतहिते रताः हो जाता है। फिर उसके स्थूलशरीरसे होनेवाली क्रियाएँ? सूक्ष्मशरीरसे होनेवाला परहितचिन्तन और कारणशरीरसे होनेवाली स्थिरता -- तीनों ही संसारके मात्र प्राणियोंके हितके लिये होती हैं। कारण

कि शरीर आदि सबकीसब सामग्री संसारसे अभिन्न है। उस सामग्रीसे अपना हित चाहता है -- यही गलती होती है? जो कि अपनी परिच्छिन्नतामें हेतु है।यहाँ संन्यासिनाम् पदमें त्यागी (कर्मयोगी) और संन्यासी (सांख्ययोगी) -- दोनोंकी एकता की गयी है जैसे -- कर्मयोगी कर्मोंसे असङ्ग रहता है तो सांख्ययोगी भी कर्मोंसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है। कर्मयोगी (निष्कामभावसे) कर्म करते हुए भी फलके साथ सम्बन्ध नहीं रखता तो सांख्ययोगी

कर्ममात्रके साथ किञ्चित् भी सम्बन्ध नहीं रखता। कर्मयोगी फलसे सम्बन्धविच्छेद करता है अर्थात् ममताका त्याग करता है तो सांख्ययोगी कर्तृत्वाभिमान अर्थात् अहंताका त्याग करता है। ममताका त्याग होनेपर अहंताका भी स्वतः त्याग हो जाता है और अहंताका त्याग होनेपर ममताका भी स्वतः त्याग हो जाता है। इसलिये भगवान्ने कर्मयोगमें ममताके त्यागके बाद अहंताका त्याग बताया है -- निर्ममो निरहंकारः (2। 71) और सांख्ययोगमें अहंताके

त्यागके बाद ममताका त्याग बताया है -- अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्ममः ৷৷. (18। 53)। इन दोनोंकी इस त्याग करनेकी प्रक्रियामें तो फरक है परन्तु परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिका कार्य, -- इनमेंसे किसीके भी साथ इन दोनोंका सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् तत्त्वमें कर्मयोगी और सांख्ययोगी -- दोनों एक हो जाते हैं।पहले अर्जुनने यह पूछा था कि मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहता हूँ अतः

भगवान्ने यहाँ संन्यासिनाम् पदसे दोनोंका यह तत्त्व बताया कि कर्मयोगीका यह भाव रहता है कि अपना कुछ नहीं है? अपने लिये कुछ नहीं चाहिये और अपने लिये कुछ नहीं करना है। ऐसे ही सांख्ययोगीका यह भाव रहता है कि अपना कुछ नहीं है और अपने लिये कुछ नहीं चाहिये। सांख्ययोगी प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ किञ्चिन्मात्र भी अपना सम्बन्ध नहीं मानता? इसलिये उसके लिये अपने लिये कुछ नहीं करना है -- यह कहना ही नहीं बनता।यहाँ

त्यागिनाम् पद न देकर संन्यासिनाम् पद देनेका यह तात्पर्य है कि जो निर्लिप्तता सांख्ययोगसे होती है? वही निर्लिप्तता त्यागसे अर्थात् कर्मयोगसे भी होती है (गीता 5। 4 -- 5)। दूसरी बात? यहाँतक भगवान्ने कर्मयोगसे निर्लिप्तता बतायी? अब संन्यासिनाम् पद कहकर आगे सांख्ययोगसे निर्लिप्तता बतानेका बीज भी डाल देते हैं।कर्मसम्बन्धी विशेष बातपुरुष और प्रकृति -- ये दो हैं। इनमेंसे पुरुषमें कभी परिवर्तन नहीं होता और

प्रकृति कभी परिवर्तनरहित नहीं होती। जब यह पुरुष प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है? तब प्रकृतिकी क्रिया पुरुषका कर्म बन जाता है क्योंकि प्रकृतिके साथ सम्बन्ध माननेसे तादात्म्य हो जाता है। तादात्म्य होनेसे जो प्राकृत वस्तुएँ प्राप्त हैं? उनमें ममता होती है और उस ममताके कारण अप्राप्त वस्तुओंकी कामना होती है। इस प्रकार जबतक कामना? ममता और तादात्म्य रहता है? तबतक जो कुछ परिवर्तनरूप क्रिया होती है? उसका

नाम कर्म है।तादात्म्यके टूटनेपर वही कर्म पुरुषके लिये अकर्म हो जाता है अर्थात् वह कर्म क्रियामात्र रह जाता है? उसमें फलजनकता नहीं रहती -- यह कर्ममें अकर्म है। अकर्मअवस्थामें अर्थात् स्वरूपका अनुभव होनेपर उस महापुरुषके शरीरसे जो क्रिया होती रहती है? वह अकर्ममें कर्म है (गीता 4। 18)। तात्पर्य यह हुआ कि अपने निर्लिप्त स्वरूपका अनुभव न होनेपर भी वास्तवमें सब क्रियाएँ प्रकृति और उसके कार्य शरीरमें होती

हैं परन्तु प्रकृति या शरीरसे अपनी पृथक्ताका अनुभव न होनेसे वे क्रियाएँ कर्म बन जाती हैं (गीता 3। 27 13। 29)।कर्म तीन तरहके होते हैं -- क्रियमाण? सञ्चित और प्रारब्ध। अभी वर्तमानमें जो कर्म किये जाते हैं? वे क्रियमाण कर्म कहलाते हैं (टिप्पणी प0 882.1)। वर्तमानसे पहले इस जन्ममें किये हुए अथवा पहलेके अनेक मनुष्यजन्मोंमें किये हुए जो कर्म संगृहीत हैं? वे सञ्चित कर्म कहलाते हैं। सञ्चितमेंसे जो कर्म फल

देनेके लिये प्रस्तुत (उन्मुख) हो गये हैं अर्थात् जन्म? आयु और अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें परिणत होनेके लिये सामने आ गये हैं? वे प्रारब्ध कर्म कहलाते हैं।क्रियमाण कर्म दो तरहके होते हैं -- शुभ और अशुभ। जो कर्म शास्त्रानुसार विधिविधानसे किये जाते हैं? वे शुभकर्म कहलाते हैं और काम? क्रोध? लोभ? आसक्ति आदिको लेकर जो शास्त्रनिषिद्ध कर्म किये जाते हैं? वे अशुभकर्म कहलाते हैं।शुभ अथवा अशुभ प्रत्येक

क्रियमाण कर्मका एक तो फलअंश बनता है और एक संस्कारअंश। ये दोनों भिन्नभिन्न हैं।चित्रक्रियमाण कर्म फलअंश संस्कारअंश दृष्ट अदृष्ट तात्कालिक कालान्तिरक लौकिक पारलौकिक शुद्ध अशुद्धक्रियमाण कर्मके फलअंशके दो भेद हैं -- दृष्ट और अदृष्ट। इनमेंसे दृष्टके भी दो भेद होते हैं -- तात्कालिक और कालान्तिरक। जैसे? भोजन करते हुए जो रस आता है? सुख होता है? प्रसन्नता होती है और तृप्ति

होती है -- यह दृष्टका तात्कालिक फल है और भोजनके परिणाममें आयु? बल? आरोग्य आदिका बढ़ना -- यह दृष्टका कालान्तिरक फल है। ऐसे ही जिसका अधिक मिर्च खानेका स्वभाव है? वह जब अधिक मिर्चवाले पदार्थ खाता है? तब उसको प्रसन्नता होती है? सुख होता है और मिर्चकी तीक्ष्णताके कारण मुँहमें? जीभमें जलन होती है? आँखोंसे और नाकसे पानी निकलता है? सिरसे पसीना निकलता है -- यह दृष्टका तात्कालिक फल है और कुपथ्यके कारण परिणाममें

पेटमें जलन और रोग? दुःख आदिका होना -- यह दृष्टका कालान्तिरक फल है।इसी प्रकार अदृष्टके दो भी भेद होते हैं -- लौकिक और पारलौकिक। जीतेजी ही फल मिल जाय -- इस भावसे यज्ञ? दान? तप? तीर्थ? व्रत? मन्त्रजप आदि शुभकर्मोंको विधिविधानसे किया जाय और उसका कोई प्रबल प्रतिबन्ध न हो तो यहाँ ही पुत्र? धन? यश? प्रतिष्ठा आदि अनुकूलकी प्राप्ति होना और रोग? निर्धनता आदि प्रतिकूलकी निवृत्ति होना -- यह अदृष्टका लौकिक फल

है (टिप्पणी प0 882.2) और मरनेके बाद स्वर्ग आदिकी प्राप्ति हो जाय -- इस भावसे यथार्थ विधिविधान और श्रद्धाविश्वासपूर्वक जो यज्ञ? दान? तप? आदि शुभकर्म किये जायँ तो मरनेके बाद स्वर्ग आदि लोकोंकी प्राप्ति होना -- यह अदृष्टका पारलौकिक फल है। ऐसे ही डाका डालने? चोरी करने? मनुष्यकी हत्या करने आदि अशुभकर्मोंका फल यहाँ ही कैद? जुर्माना? फाँसी आदि होना -- यह अदृष्टका लौकिक फल है और पापोंके कारण मरनेके बाद नरकोंमें

जाना और पशुपक्षी? कीटपतंग आदि बनना -- यह अदृष्टका पारलौकिक फल है।पापपुण्यके इस लौकिक और पारलौकिक फलके विषयमें एक बात और समझनेकी है कि जिन पापकर्मोंका फल यहीं कैद? जुर्माना? अपमान? निन्दा आदिके रूपमें भोग लिया है? उन पापोंका फल मरनेके बाद भोगना नहीं पड़ेगा। परन्तु व्यक्तिके पाप कितनी मात्राके थे और उनका भोग कितनी मात्रामें हुआ अर्थात् उन पापकर्मोंका फल उसने पूरा भोगा या अधूरा भोगा -- इसका पूरा पता

मनुष्यको नहीं लगता क्योंकि मनुष्यके पास इसका कोई मापतौल नहीं है। परन्तु भगवान्को इसका पूरा पता है अतः उनके कानूनके अनुसार उन पापोंका फल यहाँ जितने अंशमें कम भोगा गया है? उतना इस जन्ममें या मरनेके बाद भोगना ही पड़ेगा। इसलिये मनुष्यको ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये कि मेरा पाप तो कम था? पर दण्ड अधिक भोगना पड़ा अथवा मैंने पाप तो किया नहीं? पर दण्ड मुझे मिल गया कारण कि यह सर्वज्ञ? सर्वसुहृद्? सर्वसमर्थ भगवान्का

विधान है कि पापसे अधिक दण्ड कोई नहीं भोगता और जो दण्ड मिलता है? वह किसीनकिसी पापका ही फल होता है (टिप्पणी प0 883)।इसी तरह धनसम्पत्ति? मान? आदर? प्रशंसा? नीरोगता आदि अनुकूल परिस्थितिके रूपमें पुण्यकर्मोंका जितना फल यहाँ भोग लिया है? उतना अंश तो यहाँ नष्ट हो ही गया और जितना बाकी रह गया है? वह परलोकमें फिर भोगा जा सकता है। यदि पुण्यकर्मोंका पूरा फल यहीं भोग लिया गया तो पुण्य यहींपर समाप्त हो जायँगे।क्रियमाणकर्मके

संस्कारअंशके भी दो भेद हैं -- शुद्ध एवं पवित्र संस्कार और अशुद्ध एवं अपवित्र संस्कार। शास्त्रविहित कर्म करनेसे जो संस्कार पड़ते हैं? वे शुद्ध एवं पवित्र होते हैं और शास्त्र? नीति? लोकमर्यादाके विरुद्ध कर्म करनेसे जो संस्कार पड़ते हैं? वे अशुद्ध एवं अपवित्र होते हैं।इन दोनों शुद्ध और अशुद्ध संस्कारोंको लेकर स्वभाव (प्रकृति? आदत) बनता है। उन संस्कारोंमेंसे अशुद्ध अंशका सर्वथा नाश करनेपर स्वभाव शुद्ध?

निर्मल? पवित्र हो जाता है परन्तु जिन पूर्वकृत कर्मोंसे स्वभाव बना है? उन कर्मोंकी भिन्नताके कारण जीवन्मुक्त पुरुषोंके स्वभावोंमें भी भिन्नता रहती है। इन विभिन्न स्वभावोंके कारण ही उनके द्वारा विभिन्न कर्म होते हैं? पर वे कर्म दोषी नहीं होते? प्रत्युत सर्वथा शुद्ध होते हैं और उन कर्मोंसे दुनियाका कल्याण होता है।संस्कारअंशसे जो स्वभाव बनता है? वह एक दृष्टिसे महान् प्रबल होता है -- स्वभावो मूर्ध्नि वर्तते

अतः उसे मिटाया नहीं जा सकता (टिप्पणी प0 884)। इसी प्रकार ब्राह्मण? क्षत्रिय आदि वर्णोंका जो स्वभाव है? उसमें कर्म करनेकी मुख्यता रहती है। इसलिये भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि जिस कर्मको तू मोहवश नहीं करना चाहता? उसको भी अपने स्वाभाविक कर्मसे बँधा हुआ परवश होकर करेगा (गीता 18। 60)।अब इसमें विचार करनेकी एक बात है कि एक ओर तो स्वभावकी महान् प्रबलता है कि उसको कोई छोड़ ही नहीं सकता और दूसरी ओर मनुष्यजन्मके

उद्योगकी महान् प्रबलता है कि मनुष्य सब कुछ करनेमें स्वतन्त्र है। अतः इन दोनोंमें किसकी विजय होगी और किसकी पराजय होगी इसमें विजयपराजयकी बात नहीं है। अपनीअपनी जगह दोनों ही प्रबल हैं। परन्तु यहाँ स्वभाव न छोड़नेकी जो बात है? वह जातिविशेषके स्वभावकी बात है। तात्पर्य है कि जीव जिस वर्णमें जन्मा है? जैसा रजवीर्य था? उसके अनुसार बना हुआ जो स्वभाव है? उसको कोई बदल नहीं सकता अतः वह स्वभाव दोषी नहीं है? निर्दोष

है। जैसे? ब्राह्मण? क्षत्रिय आदि वर्णोंका जो स्वभाव है? वह स्वभाव नहीं बदल सकता और उसको बदलनेकी आवश्कयकता भी नहीं है तथा उसको बदलनेके लिये शास्त्र भी नहीं कहता। परन्तु उस स्वभावमें जो अशुद्धअंश (रागद्वेष) है? उसको मिटानेकी सामर्थ्य भगवान्ने मनुष्यको दी है। अतः जिन दोषोंसे मनुष्यका स्वभाव अशुद्ध बना है? उन दोषोंको मिटाकर मनुष्य स्वतन्त्रतापूर्वक अपने स्वभावको शुद्ध बना सकता है। मनुष्य चाहे तो कर्मयोगकी

दृष्टिसे अपने प्रयत्नसे रागद्वेषको मिटाकर स्वभाव शुद्ध बना ले (गीता 3। 34)? चाहे भक्तियोगकी दृष्टिसे सर्वथा भगवान्के शरण होकर अपना स्वभाव शुद्ध बना ले (गीता 18। 62)। इस प्रकार प्रकृति(स्वभाव) की प्रबलता भी सिद्ध हो गयी और मनुष्यकी स्वतन्त्रता भी सिद्ध हो गयी। तात्पर्य यह हुआ कि शुद्ध स्वभावको रखनेमें प्रकृतिकी प्रबलता है और अशुद्ध स्वभावको मिटानेमें मनुष्यकी स्वतन्त्रता है।जैसे? लोहेकी तलवारको पारस

छुआ दिया जाय तो तलवार सोना बन जाती है परन्तु उसकी मार? धार और आकार -- ये तीनों नहीं बदलते। इस प्रकार सोना बनानेमें पारसकी प्रधानता रही और मारधारआकार में तलवारकी प्रधानता रही। ऐसे ही जिन लोगोंने अपने स्वभावको परम शुद्ध बना लिया है? उनके कर्म भी सर्वथा शुद्ध होते हैं। परन्तु स्वभावके शुद्ध होनेपर भी वर्ण? आश्रम? सम्प्रदाय? साधनपद्धति? मान्यता आदिके अनुसार आपसमें उनके कर्मोंकी भिन्नता रहती है। जैसे?

किसी ब्राह्मणको तत्त्वबोध हो जानेपर भी वह खानपान आदिमें पवित्रता रखेगा और अपने हाथसे बनाया हुआ भोजन ही ग्रहण करेगा क्योंकि उसके,स्वभावमें पवित्रता है। परन्तु किसी हरिजन आदि साधारण वर्णवालेको तत्त्वबोध हो जाय तो वह खानपान आदिमें पवित्रता नहीं रखेगा और दूसरोंकी जूठन भी खा लेगा क्योंकि उसका स्वभाव ही ऐसा पड़ा हुआ है। पर ऐसा स्वभाव उसके लिये दोषी नहीं होगा।जीवका असत्के साथ सम्बन्ध जोड़नेका स्वभाव अनादिकालसे

बना हुआ है? जिसके कारण वह जन्ममरणके चक्करमें पड़ा हुआ है और बारबार ऊँचनीच योनियोंमें जाता है। उस स्वभावको मनुष्य शुद्ध कर सकता है अर्थात् उसमें जो कामना? ममता और तादात्म्य हैं? उनको मिटा सकता है। कामना? ममता और तादात्म्यके मिटनेके बाद जो स्वभाव रहता है? वह स्वभाव दोषी नहीं रहता। इसलिये उस स्वभावको मिटाना नहीं है और मिटानेकी आवश्यकता भी नहीं है।जब मनुष्य अहंकारका आश्रय छोड़ कर सर्वथा भगवान्के शरण हो

जाता है? तब उसका स्वभाव शुद्ध हो जाता है जैसे -- लोहा पारसके स्पर्शसे शुद्ध सोना बन जाता है। स्वभाव शुद्ध होनेसे फिर वह स्वभावज कर्म करते हुए भी दोषी और पापी नहीं बनता (गीता 18। 47)। सर्वथा भगवान्के शरण होनेके बाद भक्तका प्रकृतिके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता। फिर भक्तके जीवनमें भगवान्का स्वभाव काम करता है। भगवान् समस्त प्राणियोंके सुहृद् हैं -- सुहृदं सर्वभूतानाम् (गीता 5। 29) तो भक्त भी समस्त प्राणियोंका

सुहृद् हो जाता है -- सुहृदः सर्वदेहिनाम् (श्रीमद्भा0 3। 25। 21)।इसी तरह कर्मयोगकी दृष्टिसे जब मनुष्य रागद्वेषको मिटा देता है? तब उसके स्वभावकी शुद्ध हो जाती है? जिससे अपने स्वार्थका भाव मिटकर केवल दुनियाके हितका भाव स्वतः हो जाता है। जैसे भगवान्का स्वभाव प्राणिमात्रका हित करनेका है? ऐसे ही उसका स्वभाव भी प्राणिमात्रका हित करनेका हो जाता है। जब उसकी सब चेष्टाएँ प्राणिमात्रके हितमें हो जाती हैं? तब

उसकी भगवान्की सर्वभूतसुहृत्ताशक्तिके साथ एकता हो जाती है। उसके उस स्वभावमें भगवान्की सुहृत्ताशक्ति कार्य करने लगती है।वास्तवमें भगवान्की यह सर्वभूतसुहृत्ताशक्ति मनुष्यमात्रके लिये समान रीतिसे खुली हुई है परन्तु अपने अहंकार और रागद्वेषके कारण उस शक्तिमें बाधा लग जाती है अर्थात् वह शक्ति कार्य नहीं करती। महापुरुषोंमें अहंकार (व्यक्तित्व) और रागद्वेष नहीं रहते? इसलिये उनमें यह शक्ति कार्य करने लग जाती

है।चित्रसञ्चित कर्म फलअंश संस्कारअंश प्रारब्ध स्फुरणाअनेक मनुष्यजन्मोंमें किये हुए जो कर्म (फलअंश और संस्कारअंश) अन्तःकरणमें संगृहीत रहते हैं? वे सञ्चित कर्म कहलाते हैं। उनमें फलअंशसे तो प्रारब्ध बनता है और संस्कारअंशसे स्फुरणा होती रहती है। उन स्फुरणाओंमें भी वर्तमानमें किये गये जो नये क्रियमाण कर्म सञ्चितमें भरती हुए हैं? प्रायः उनकी ही स्फुरणा होती है। कभीकभी सञ्चितमें भरती हुए पुराने

कर्मोंकी स्फुरणा भी हो जाती है (टिप्पणी प0 885) जैसे किसी बर्तनमें पहले प्याज डाल दें और उसके ऊपर क्रमशः गेहूँ? चना? ज्वार? बाजरा? डाल दें तो निकालते समय जो सबसे पीछे डाला था? वही (बाजरा) सबसे पहले निकलेगा? पर बीचमें कभीकभी प्याजका भी भभका आ जायेगा। परन्तु यह दृष्टान्त पूरा नहीं घटता क्योंकि प्याज? गेहूँ आदि सावयव,पदार्थ हैं और सञ्चित कर्म निरवयव हैं। यह दृष्टान्त केवल इतने ही अंशमें बतानेके लिये

दिया है। कि नये क्रियमाण कर्मोंकी स्फुरणा ज्यादा होती है और कभीकभी पुराने कर्मोंकी भी स्फुरणा होती है।इसी तरह जब नींद आती है तो उसमें भी स्फुरणा होती है। नींदमें जाग्रत्अवस्थाके दब जानेके कारण सञ्चितकी वह स्फुरणा स्वप्नरूपसे दीखने लग जाती है? उसीको स्वप्नावस्था कहते हैं (टिप्पणी प0 886)। स्वप्नावस्थामें बुद्धिकी सावधानी न रहनेके कारण क्रम? व्यतिक्रम और अनुक्रम ये नहीं रहते। जैसे? शहर तो दिल्लीका दीखता

है और बाजार बम्बईका तथा उस बाजारमें दूकानें कलकत्ताकी दीखती हैं? कोई जीवित आदमी दीख जाता है अथवा किसी मरे हुए आदमीसे मिलना हो जाता है? बातचीत हो जाती है? आदिआदि।जाग्रत्अवस्थामें हरेक मनुष्यके मनमें अनेक तरहकी स्फुरणाएँ होती रहती हैं। जब जाग्रत्अवस्थामें शरीर? इन्द्रियाँ और मनपरसे बुद्धिका अधिकार हट जाता है? तब मनुष्य जैसा मनमें आता है? वैसा बोलने लगता है। इस तरह उचितअनुचितका विचार करनेकी शक्ति काम

न करनेसे वह सीधासरल पागल कहलाता है। परन्तु जिसके शरीर? इन्द्रियाँ और मनपर बुद्धिका अधिकार रहता है? वह जो उचित समझता है? वही बोलता है और जो अनुचित समझता है? वह नहीं बोलता। बुद्धि सावधान रहनेसे वह सावचेत रहता है? इसलिये वह चतुर पागल हैइस प्रकार मनुष्य जबतक परमात्मप्राप्ति नहीं कर लेता? तबतक वह अपनेको स्फुरणाओंसे बचा नहीं सकता। परमात्मप्राप्ति होनेपर बुरी स्फुरणाएँ सर्वथा मिट जाती हैं। इसलिये जीवन्मुक्त

महापुरुषके मनमें अपवित्र पुरे विचार कभी आते ही नहीं। अगर उसके कहलानेवाले शरीरमें प्रारब्धवश (व्याधि आदि किसी कारणवश) कभी बेहोशी? उन्माद आदि हो जाता है तो उसमें भी वह न तो शास्त्रनिषिद्ध बोलता है और न शास्त्रनिषिद्ध कुछ करता ही है क्योंकि अन्तःकरण शुद्ध हो जानेसे शास्त्रनिषिद्ध बोलना या करना उसके स्वभावमें नहीं रहता।प्रारब्ध कर्म प्रारब्ध कर्म अनुकूल परिस्थिति मिश्रित (अनुकूलप्रतिकूल) परिस्थिति

प्रतिकूल परिस्थिति स्वेच्छापूर्वक क्रिया (प्रवृत्ति) अनिच्छापूर्वक क्रिया परेच्छापूर्वक क्रिया स्वेच्छापूर्वक क्रिया अनिच्छापूर्वक क्रिया परेच्छापूर्वक क्रिया स्वेच्छापूर्वक क्रिया अनिच्छापूर्वक क्रिया परेच्छापूर्वक क्रिया,सञ्चितमेंसे जो कर्म फल देनेके लिये सम्मुख होते हैं? उन कर्मोंको प्रारब्ध कर्म कहते हैं (टिप्पणी प0 887)। प्रारब्ध कर्मोंका फल तो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितिके

रूपमें सामने आता है परन्तु उन प्रारब्ध कर्मोंको भोगनेके लिये प्राणियोंकी प्रवृत्ति तीन प्रकारसे होती है -- (1) स्वेच्छापूर्वक? (2) अनिच्छा(दैवेच्छा)पूर्वक और (3) परेच्छापूर्वक। उदाहरणार्थ --(1) किसी व्यापारीने माल खरीदा तो उसमें मुनाफा हो गया। ऐसे ही किसी दूसरे व्यापारीने माल खरीदा तो उसमें घाटा लग गया। इन दोनोंमें मुनाफा होना और घाटा लगना तो उनके शुभअशुभकर्मोंसे बने हुए प्रारब्धके फल हैं परन्तु माल

खरीदनेमें उनकी प्रवृत्ति स्वेच्छापूर्वक हुई है।(2) कोई सज्जन कहीं जा रहा था तो आगे आनेवाली नदीमें बाढ़के प्रवाहके कारण एक धनका टोकरा बहकर आया और उस सज्जनने उसे निकाल लिया। ऐसे ही कोई सज्जन कहीं जा रहा था तो उसपर वृक्षकी एक टहनी गिर पड़ी और उसको चोट लग गयी। इन दोनोंमें धनका मिलना और चोट लगना तो उनके शुभअशुभकर्मोंसे बने हुए प्रारब्धके फल हैं परन्तु धनका टोकरा मिलना और वृक्षकी टहनी गिरना -- यह प्रवृत्ति

अनिच्छा(दैवेच्छा) पूर्वक हुई है।(3) किसी धनी व्यक्तिने किसी बच्चेको गोद ले लिया अर्थात् उसको पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया? जिससे उसका सब धन उस बच्चेको मिल गया। ऐसे ही चोरोंने किसीका सब धन लूट लिया। इन दोनोंमें बच्चेको धन मिलना और चोरीमें धनका चला जाना तो उनके शुभअशुभकर्मोंसे बने हुए प्रारब्धके फल हैं परन्तु गोदमें जाना और चोरी होना -- यह प्रवृत्ति परेच्छापूर्वक हुई है।यहाँ एक बात और समझ लेनी चाहिये

कि कर्मोंका फल कर्म नहीं होता? प्रत्युत परिस्थिति होती है अर्थात् प्रारब्ध कर्मोंका फल परिस्थितिरूपसे सामने आता है। अगर नये (क्रियमाण) कर्मको प्रारब्धका फल मान लिया जाय तो फिर ऐसा करो? ऐसा मत करो -- यह शास्त्रोंका? गुरुजनोंका विधिनिषेध निरर्थक हो जायगा। दूसरी बात? पहले जैसे कर्म किये थे? उन्हींके अनुसार जन्म होगा और उन्हींके अनुसार कर्म होंगे तो वे कर्म फिर आगे नये कर्म पैदा कर देंगे? जिससे यह कर्मपरम्परा

चलती ही रहेगी अर्थात् इसका कभी अन्त ही नहीं जायेगा।प्रारब्ध कर्मसे मिलनेवाले फलके दो भेद हैं -- प्राप्त फल और अप्राप्त फल। अभी प्राणियोंके सामने जो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति आ रही है? वह प्राप्त फल है और इसी जन्ममें जो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भविष्यमें आनेवाली है वह अप्राप्त फल है।क्रियमाण कर्मोंका जो फलअंश सञ्चितमें जमा रहता है? वही प्रारब्ध बनकर अनुकूल? प्रतिकूल और मिश्रित परिस्थितिके रूपमें

मनुष्यके सामने आता है। अतः जबतक सञ्चित कर्म रहते हैं? तबतक प्रारब्ध बनता ही रहता है और प्रारब्ध परिस्थितिके रूपमें परिणत होता ही रहता है। यह परिस्थिति मनुष्यको सुखीदुःखी होनेके लिये बाध्य नहीं करती। सुखीदुःखी होनेमें तो परिवर्तनशील परिस्थितिके साथ सम्बन्ध जो़ड़ना ही मुख्य कारण है। परिस्थितिके साथ सम्बन्ध जोड़ने अथवा न जोड़नेमें यह मनुष्य सर्वथा स्वाधीन है? पराधीन नहीं है। जो परिवर्तनशील परिस्थितिके

साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है? वह अविवेकी पुरुष तो सुखीदुःखी होता ही रहता है। परन्तु जो परिस्थितिके साथ सम्बन्ध नहीं मानता? वह विवेकी पुरुष कभी सुखीदुःखी नहीं होता अतः उसकी स्थिति स्वतः साम्यावस्थामें होती है? जो कि उसका स्वरूप है।कर्मोंमें मनुष्यके प्रारब्धकी प्रधानता है या पुरुषार्थकी अथवा प्रारब्ध बलवान् है या पुरुषार्थ -- इस विषयमें बहुतसी शङ्काएँ हुआ करती हैं। उनके समाधानके लिये पहले यह समझ लेना

जरूरी है कि प्रारब्ध और पुरुषार्थ क्या हैमनुष्यमें चार तरहकी चाहना हुआ करती है -- एक धनकी? दूसरी धर्मकी? तीसरी भोगकी और चौथी मुक्तिकी। प्रचलित भाषामें इन्हीं चारोंको अर्थ? धर्म? काम और मोक्षके नामसे कहा जाता है --, (1) अर्थ -- धनको अर्थ कहते हैं। वह धन दो तरहका होता है -- स्थावर और जङ्गम। सोना? चाँदी? रुपये? जमीन? जायदाद? मकान आदि स्थावर हैं और गाय? भैंस? घोड़ा? ऊँट? भेड़? बकरी आदि जङ्गम हैं।(2)

धर्म -- सकाम अथवा निष्कामभावसे जो यज्ञ? तप? दान? व्रत? तीर्थ आदि किये जाते हैं? उसको धर्म,कहते हैं।(3) काम -- सांसारिक सुखभोगको काम कहते हैं। वह सुखभोग आठ तरहका होता है -- शब्द? स्पर्श? रूप? रस? गन्ध? मान? बड़ाई और आराम।(क) शब्द -- शब्द दो तरहका होता है -- वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक। व्याकरण? कोश? साहित्य? उपन्यास? गल्प? कहानी आदि वर्णात्मक शब्द हैं (टिप्पणी प0 888.1)। खाल? तार और फूँकके तीन बाजे

और तालका आधा बाजा -- ये साढ़े तीन प्रकारके बाजे ध्वन्यात्मक शब्दको प्रकट करनेवाले हैं (टिप्पणी प0 888.2)। इन वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक शब्दोंको सुननेसे जो सुख मिलता है? वह शब्दका सुख है।(ख) स्पर्श -- स्त्री? पुत्र? मित्र आदिके साथ मिलनेसे तथा ठण्डा? गरम? कोमल आदिसे अर्थात् उनका त्वचाके साथ संयोग होनेसे जो सुख होता है? वह स्पर्शका सुख है।(ग) रूप -- नेत्रोंसे खेल? तमाशा? सिनेमा? बाजीगरी? वन? पहाड़? सरोवर?

मकान आदिकी सुन्दरताको देखकर जो सुख होता है? वह रूपका सुख है।(घ) रस -- मधुर (मीठा)? अम्ल (खट्टा)? लवण (नमकीन)? कटु (कड़वा)? तिक्त (तीखा) और कषाय (कसैला) -- इन छः रसोंको चखनेसे जो सुख होता है? वह रसका सुख है।(ङ) गन्ध -- नाकसे अतर? तेल? फुलेल? लवेण्डर? पुष्प आदि सुगन्धवाले और लहसुन? प्याज आदि दुर्गन्धवाले पदार्थोंको सूघँनेसे जो सुख होता है? वह गन्धका सुख है।(च) मान -- शरीरका आदरसत्कार होनेसे जो सुख होता

है? वह मानका सुख है।(छ) बड़ाई -- नामकी प्रशंसा? वाहवाह होनेसे जो सुख होता है? वह बड़ाईका सुख है।(ज) आराम -- शरीरसे परिश्रम न करनेसे अर्थात् निकम्मे पड़े रहनेसे जो सुख होता है? वह आरामका सुख है।(4) मोक्ष -- आत्मसाक्षात्कार? तत्त्वज्ञान? कल्याण? उद्धार? मुक्ति? भगवद्दर्शन? भगवत्प्रेम आदिका नाम मोक्ष है।इन चारों (अर्थ? धर्म? काम और मोक्ष) में देखा जाये तो अर्थ और धर्म -- दोनों ही परस्पर एकदूसरेकी वृद्धि

करनेवाले हैं अर्थात् अर्थसे धर्मकी और धर्मसे अर्थकी वृद्धि होती है। परन्तु धर्मका पालन कामनापूर्तिके लिये किया जाय तो वह धर्म भी कामनापूर्ति करके नष्ट हो जाता है और अर्थको कामनापूर्तिमें लगाया जाय तो वह अर्थ भी कामनापूर्ति करके नष्ट हो जाता है। तात्पर्य है कि कामना धर्म और अर्थ -- दोनोंको खा जाती है। इसीलिये गीतामें भगवान्ने कामनाको महाशन (बहुत खानेवाला) बताते हुए उसके त्यागकी बात विशेषतासे कही है

(3। 37 -- 43)।यदि धर्मका अनुष्ठान कामनाका त्याग करके किया जाय तो वह अन्तःकरण शुद्ध करके मुक्त कर देता है। ऐसे ही धनको कामनाका त्याग करके दूसरोंके उपकारमें? हितमें? सुखमें खर्च किया जाय तो वह भी अन्तःकरण शुद्ध करके मुक्त कर देता है।अर्थ? धर्म? काम और मोक्ष -- इन चारोंमें अर्थ (धन) और काम (भोग) की प्राप्तिमें प्रारब्धकी मुख्यता और पुरुषार्थकी गौणता है? तथा धर्म और मोक्षमें पुरुषार्थकी मुख्यता और प्रारब्धकी

गौणता है। प्रारब्ध और पुरुषार्थ -- दोनोंका क्षेत्र अलगअलग है और दोनों ही अपनेअपने क्षेत्रमें प्रधान हैं। इसलिये कहा है -- संतोषस्त्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने। त्रिषु चैव न कर्तव्यः स्वध्याये जपदानयोः।।अर्थात् अपनी स्त्री? पुत्र? परिवार? भोजन और धनमें तो सन्तोष करना चाहिये और स्वाध्याय? पाठपूजा? नामजप? कीर्तन और दान करनेमें कभी सन्तोष नहीं करना चाहिये। तात्पर्य यह हुआ कि प्रारब्धके फल -- धन

और भोगमें तो सन्तोष करना चाहिये क्योंकि वे प्रारब्धके अनुसार जितने मिलनेवाले हैं? उतने ही मिलेंगे? उससे अधिक नहीं। परन्तु धर्मका अनुष्ठान और अपना कल्याण करनेमें कभी सन्तोष नहीं करना चाहिये क्योंकि यह नया पुरुषार्थ है और इसी पुरुषार्थके लिये मनुष्यशरीर मिला है।कर्मके दो भेद हैं -- शुभ (पुण्य) और अशुभ (पाप)। शुभकर्मका फल अनुकूल परिस्थिति प्राप्त होना है और अशुभकर्मका फल प्रतिकूल परिस्थिति प्राप्त होना

है। कर्म बाहरसे किये जाते हैं? इसलिये उन कर्मोंका फल भी बाहरकी परिस्थितिके रूपमें ही प्राप्त होता है। परन्तु उन परिस्थितियोंसे जो सुखदुःख होते हैं? वे भीतर होते हैं। इसलिये उन परिस्थितियोंमें सुखी तथा दुःखी होना शुभाशुभकर्मोंका अर्थात् प्रारब्धका फल नहीं है? प्रत्युत अपनी मूर्खताका फल है। अगर वह मूर्खता चली जाय? भगवान्पर (टिप्पणी प0 889.1) अथवा प्रारब्धपर (टिप्पणी प0 889.2) विश्वास हो जाय तो प्रतिकूलसेप्रतिकूल

परिस्थिति आनेपर भी चित्तमें प्रसन्नता होगी? हर्ष होगा। कारण कि प्रतिकूल परिस्थितिमें पाप कटते हैं? आगे पाप न करनेमें सावधानी आती है और पापोंके नष्ट होनेसे अन्तःकरणकी शुद्ध होती है।साधकको अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग करना चाहिये? दुरुपयोग नहीं। अनुकूल परिस्थिति आ जाय तो अनुकूल सामग्रीको दूसरोंके हितके लिये सेवाबुद्धिसे खर्च करना अनुकूल परिस्थितिका सदुपयोग है और उसका सुखबुद्धिसे भोग करना दुरुपयोग

है। ऐसे ही प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय तो सुखकी इच्छाका त्याग करना और मेरे पूर्वकृत पापोंका नाश करनेके लिये? भविष्यमें पाप न करनेकी सावधानी रखनेके लिये और मेरी उन्नति करनेके लिये ही प्रभुकृपासे ऐसी परिस्थिति आयी है -- ऐसा समझकर परम प्रसन्न रहना प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग है और उससे दुःखी होना दुरुपयोग है।मनुष्यशरीर सुखदुःख भोगनेके लिये नहीं है। सुख भोगनेके स्थान स्वर्गादिक हैं और दुःख भोगनेके स्थान

नरक तथा चौरासी लाख योनियाँ हैं। इसलिये वे भोगयोनियाँ हैं और मनुष्य कर्मयोनि है। परन्तु यह कर्मयोनि उनके लिये है जो मनुष्यशरीरमें सावधान नहीं होते? केवल जन्ममरणके सामान्य प्रवाहमें ही पड़े हुए हैं। वास्तवमें मनुष्यशरीर सुखदुःखसे ऊँचा उठनेके लिये अर्थात् मुक्तिकी प्राप्तिके लिये ही मिला है। इसलिये इसको कर्मयोनि न कहकर साधनयोनि ही कहना चाहिये।प्रारब्धकर्मोंके फलस्वरूप जो अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति

आती है? उन दोनोंमें अनुकूल परिस्थितिका स्वरूपसे त्याग करनेमें तो मनुष्य स्वतन्त्र है? पर प्रतिकूल परिस्थितिका स्वरूपसे त्याग करनेमें मनुष्य परतन्त्र है अर्थात् उसका स्वरूपसे त्याग नहीं किया जा सकता। कारण यह है कि अनुकूल परिस्थिति दूसरोंका हित करने? उन्हें सुख देनेके फलस्वरूप बनी है और प्रतिकूल परिस्थिति दूसरोंको दुःख देनेके फलस्वरूप बनी है। इसको एक दृष्टान्तसे इस प्रकार समझ सकते हैं -- श्यामलालने

रामलालको सौ रुपये उधार दिये। रामलालने वायदा किया कि अमुक महीने मैं ब्याजसहित,रुपये लौटा दूँगा। महीना बीत गया? पर रामलालने रुपये नहीं लौटाये तो श्यामलाल रामलालके घर पहुँचा और बोला -- तुमने वायदेके अनुसार रुपये नहीं दिये अब दो। रामलालने कहा -- अभी मेरे पास रुपये नहीं हैं? परसों दे दूँगा। श्यामलाल तीसरे दिन पहुँचा और बोला -- लाओ मेरे रुपये तो रामलालने कहा -- अभी मैं आपके पैसे नहीं जुटा सका? परसों आपके

रुपये जरूर दूँगा। तीसरे दिन फिर श्यामलाल पहुँचा और बोला -- रुपये दो तो रामलाल ने कहा -- कल जरूर दूँगा। दूसरे दिन श्यामलाल फिर पहुँचा और बोला -- लाओ मेरे रुपये रामलालने कहा -- रुपये जुटे नहीं? मेरे पास रुपये हैं नहीं? तो मैं कहाँसे दूँ परसों आना। रामलालकी बातें सुनकर श्यामलालको गुस्सा आ गया और परसोंपरसों करता है? रुपये देता नहीं -- ऐसा कहकर उसने रामलालको पाँच जूते मार दिये। रामलालने कोर्टमें नालिश

(शिकायत) कर दी। श्यामलालको बुलाया गया और पूछा गया -- तुमने इसके घरपर जाकर जूता मारा है तो श्यामलालने कहा -- हाँ साहब? मैंने जूता मारा है। मैजिस्ट्रेटने पूछा -- क्यों मारा श्यामलालने कहा -- इसको मैंने रुपये दिये थे और इसने वायदा किया था कि मैं इस महीने रुपये लौटा दूँगा। महीना बीत जानेपर मैंने इसके घरपर जाकर रुपये माँगे तो कलपरसों? कलपरसों कहकर इसने मुझे बहुत तंग किया। इसपर मैंने गुस्सेमें आकर इसे पाँच

जूते मार दिये। तो सरकार पाँच जूतोंके पाँच रुपये काटकर शेष रुपये मुझे दिला दीजिये। मैजिस्ट्रेटने हँसकर कहा -- यह फौजदारी कोर्ट है। यहाँ रुपये दिलानेका कायदा (नियम) नहीं है। यहाँ दण्ड देनेका कायदा है। इसलिये आपको जूता मारनेके बदलेमें कैद या जुर्माना भोगना ही पड़ेगा। आपको रुपये लेने हों तो दीवानी कोर्टमें जाकर नालिश करो? वहाँ रुपये दिलानेका कायदा है क्योंकि वह विभाग अलग है। इस तरह अशुभकर्मोंका फल जो

प्रतिकूल परिस्थिति है? वह फौजदारी है? इसलिये उसका स्वरूपसे त्याग नहीं कर सकते और शुभकर्मोंका फल जो अनुकूल परिस्थिति है? वह दीवानी है? इसलिये उसका स्वरूपसे त्याग किया जा सकता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यके शुभअशुभकर्मोंका विभाग अलगअलग है। इसलिये शुभकर्मों (पुण्यों) और अशुभकर्मों(पापों)का अलगअलग संग्रह होता है। स्वभाविकरूपसे ये दोनों एकदूसरेसे कटते नहीं अर्थात् पापोंसे पुण्य नहीं कटते और पुण्योंसे

पाप नहीं कटते। हाँ? अगर मनुष्य पाप काटनेके उद्देश्यसे (प्रायश्चित्तरूपसे) शुभकर्म करता है? तो उसके पाप कट सकते हैं।संसारमें एक आदमी पुण्यात्मा है? सदाचारी है और दुःख पा रहा है तथा एक आदमी पापात्मा है? दुराचारी है और सुख भोग रहा है -- इस बातको लेकर अच्छेअच्छे पुरुषोंके भीतर भी यह शङ्का हो जाया करती है कि इसमें ईश्वरका न्याय कहाँ है (टिप्पणी प0 890)। इसका समाधान यह है कि अभी पुण्यात्मा जो दुःख पा रहा

है? यह पूर्वके किसी जन्ममें किये हुए पापका फल है? अभी किये हुए पुण्यका नहीं। ऐसे ही अभी पापात्मा जो सुख भोग रहा है? यह भी पूर्वके किसी जन्ममें किये हुए पुण्यका फल है? अभी किये हुए पापका नहीं।इसमें एक तात्त्विक बात और है। कर्मोंके फलरूपमें जो अनुकूल परिस्थिति आती है? उससे सुख ही होता है और प्रतिकूल परिस्थिति आती है? उससे दुःख ही होता है -- ऐसी बात है नहीं। जैसे? अनुकूल परिस्थिति आनेपर मनमें अभिमान

होता है? छोटोंसे घृणा होती है? अपनेसे अधिक सम्पत्तिवालोंको देखकर उनसे ईर्ष्या होती है? असहिष्णुता होती है? अन्तःकरणमें जलन होती है और मनमें ऐसे दुर्भाव आते हैं कि उनकी सम्पत्ति कैसे नष्ट हो तथा वक्तपर उनको नीचा दिखानेकी चेष्टा भी होती है। इस तरह सुखसामग्री और धनसम्पत्ति पासमें रहनेपर भी वह सुखी नहीं हो सकता। परन्तु बाहरी सामग्रीको देखकर अन्य लोगोंको यह,भ्रम होता है कि वह बड़ा सुखी है। ऐसे ही किसी

विरक्त और त्यागी मनुष्यको देखकर भोगसामग्रीवाले मनुष्यको उसपर दया आती है कि बेचारेके पास धनसम्पत्ति आदि सामग्री नहीं है? बेचारा बड़ा दुःखी है परन्तु वास्तवमें विरक्तके मनमें बड़ी शान्ति और बड़ी प्रसन्नता रहती है। वह शान्ति और प्रसन्नता धनके कारण किसी धनीमें नहीं रह सकती। इसलिये धनका होनामात्र सुख नहीं है और धनका अभावमात्र दुःख नहीं है। सुख नाम हृदयकी शान्ति और प्रसन्नताका है और दुःख नाम हृदयकी जलन

और सन्तापका है।पुण्य और पापका फल भोगनेमें एक नियम नहीं है। पुण्य तो निष्कामभावसे भगवान्के अर्पण करनेसे समाप्त हो सकता है परन्तु पाप भगवान्के अर्पण करनेसे समाप्त नहीं होता। पापका फल तो भोगना ही पड़ता है क्योंकि भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध किये हुए कर्म भगवान्के अर्पण कैसे हो सकते हैं और अर्पण करनेवाला भी भगवान्के विरुद्ध कर्मोंको भगवान्के अर्पण कैसे कर सकता है प्रत्युत भगवान्की आज्ञाके अनुसार किये हुए

कर्म ही भगवान्के अर्पण होते हैं। इस विषयमें एक कहानी आती है।एक राजा अपनी प्रजासहित हरिद्वार गया। उसके साथमें सब तरहके लोग थे। उनमें एक चमार भी था। उस चमारने सोचा कि ये बनिये लोग बड़े चतुर होते हैं। ये अपनी बुद्धिमानीसे धनी बन गये हैं। अगर हम भी उनकी बुद्धिमानीके अनुसार चलें तो हम भी धनी बन जायँ ऐसा विचार करके वह एक चतुर बनियेकी क्रियाओंपर निगरानी रखकर चलने लगा। जब हरिद्वारके ब्रह्मकुण्डमें पण्डा दानपुण्यका

संकल्प कराने लगा? तब उस बनियेने कहा -- मैंने अमुक ब्राह्मणको सौ रुपये उधार दिये थे? आज मैं उनको दानरूपमें श्रीकृष्णार्पण करता हूँ पण्डेने संकल्प भरवा दिया। चमारने देखा कि इसने एक कौड़ी भी नहीं दी और लोगोंमें प्रसिद्ध हो गया कि इसने सौ रुपयोंका दान कर दिया? कितना बुद्धिमान् है मैं भी इससे कम नहीं रहूँगा। जब पण्डेने चमारसे संकल्प भरवाना शुरू किया? तब चमारने कहा -- अमुक बनियेने मुझै सौ रुपये उधार दिये

थे तो उन सौ रुपयोंको मैं श्रीकृष्णार्पण करता हूँ। उसकी ग्रामीण बोलीको पण्डा पूरी तरह समझा नहीं और संकल्प भरवा दिया। इससे चमार बड़ा खुश हो गया कि मैंने भी बनियेके समान सौ रुपयोंका दानपुण्य कर दियासब घर पहुँचे। समयपर खेती हुई। ब्राह्मण और चमारके खेतोंमें खूब अनाज पैदा हुआ। ब्राह्मण देवताने बनियेसे कहा -- सेठ आप चाहें तो सौ रुपयोंका अनाज ले लो? इससे आपको नफा भी हो सकता है। मुझे तो आपका कर्जा चुकाना है।

बनियेने कहा -- ब्राह्मण देवता जब मैं हरिद्वार गया था? तब मैंने आपको उधार दिये हुए सौ रुपये दान कर दिये। ब्राह्मण बोला -- सेठ मैंने आपसे सौ रुपये उधार लिये हैं? दान नहीं लिये। इसलिये इन रुपयोंको मैं रखना नहीं चाहता? ब्याजसहित पूरा चुकाना चाहता हूँ। सेठने कहा -- आप देना ही चाहते हैं तो अपनी बहन अथवा कन्याको दे सकते हैं। मैंने सौ रुपये भगवान्के अर्पण कर दिये हैं? इसलिये मैं तू लूँगा नहीं। अब ब्राह्मण

और क्या करता वह अपने घर लौट गया।अब जिस बनियेसे चमारने सौ रुपये लिये थे? वह बनिया चमारके खेतमें पहुँचा और बोला -- लाओ मेरे रुपये। तुम्हारा अनाज हुआ है? सौ रुपयोंका अनाज ही दे दो। चमारने सुन रखा था कि ब्राह्मणके देनेपर भी बनियेने उससे रुपये नहीं लिये। अतः उसने सोचा कि मैंने भी संकल्प कर रखा है तो मेरेको रुपये क्यों देने पड़ेंगे ऐसा सोचकर चमार बनियेसे बोला -- मैंने तो अमुक सेठकी तरह गङ्गाजीमें खड़े होकर

सब रुपये श्रीकृष्णार्पण कर दिये? तो मेरेको रुपये क्यों देने पड़ेंगे बनिया बोला -- तेरे अर्पण कर देनेसे कर्जा नहीं छूट सकता क्योंकि तूने मेरेसे कर्जा लिया है तो तेरे छोड़नेसे कैसे छूट जायगा मैं तो अपने सौ रुपये ब्याजसहित पूरे लूँगा लाओ मेरे रुपये ऐसा कहकर उसने चमारसे अपने रुपयोंका अनाज ले लिया।इस कहानीसे यह सिद्ध होता है कि हमारेपर दूसरोंका जो कर्जा है? वह हमारे छोड़नेसे नहीं छूट सकता। ऐसे ही हम

भगवदाज्ञानुसार शुभकर्मोंको तो भगवान्के अर्पण करके उनके बन्धनसे छूट सकते हैं? पर अशुभकर्मोंका फल तो हमारेको भोगना ही पड़ेगा। इसलिये शुभ और अशुभकर्मोंमें एक कायदा? कानून नहीं है। अगर ऐसा नियम बन जाय कि भगवान्के अर्पण करनेसे ऋण और पापकर्म छूट जायँ तो फिर सभी प्राणी मुक्त हो जायँ परन्तु ऐसा सम्भव नहीं है। हाँ? इसमें एक मार्मिक बात है कि अपनेआपको सर्वथा भगवान्के अर्पित कर देनेपर अर्थात् सर्वथा भगवान्के

शरण हो जानेपर पापपुण्य सर्वथा नष्ट हो जाते हैं (गीता 18। 66)।दूसरी शङ्का यह होती है कि धन और भोगोंकी प्राप्ति प्रारब्ध कर्मके अनुसार होती है -- ऐसी बात समझमें नहीं आती क्योंकि हम देखते हैं कि इन्कमटैक्स? सेल्सटैक्स आदिकी चोरी करते हैं तो धन बच जाता है और टैक्स पूरा देते हैं तो धन चला जाता है तो धनका आनाजाना प्रारब्धके अधीन कहाँ हुआ यह तो चोरीके ही अधीन हुआइसका समाधान इस प्रकार है। वास्तवमें धन प्राप्त

करना और भोग भोगना -- इन दोनोंमें ही प्रारब्धकी प्रधानता है। परन्तु इन दोनोंमें भी किसीका धनप्राप्तिका प्रारब्ध होता है? भोगका नहीं और किसीका भोगका प्रारब्ध होता है? धनप्राप्तिका नहीं तथा किसीका धन और भोग दोनोंका ही प्रारब्ध होता है। जिसका धनप्राप्तिका प्रारब्ध तो है? पर भोगका प्रारब्ध नहीं है? उसके पास लाखों रुपये रहनेपर भी बीमारीके कारण वैद्य? डॉक्टरके मना करनेपर वह भोगोंको भोग नहीं सकता? उसके खानेमें

रूखासूखा ही मिलता है। जिसका भोगका प्रारब्ध तो है? पर धनका प्रारब्ध नहीं है? उसके पास धनका अभाव होनेपर भी उसके सुखआराममें किसी तरहकी कमी नहीं रहती (टिप्पणी प0 891)। उसको किसीकी दयासे? मित्रतासे? कामधंधा मिल जानेसे प्रारब्धके अनुसार जीवननिर्वाहकी सामग्री मिलती रहती है।अगर धनका प्रारब्ध नहीं है तो चोरी करनेपर भी धन नहीं मिलेगा? प्रत्युत चोरी किसी प्रकारसे प्रकट हो जायगी तो बचा हुआ धन भी चला जायगा तथा

दण्ड और मिलेगा। यहाँ दण्ड मिले या न मिले? पर परलोकमें तो दण्ड जरूर मिलेगा। उससे वह बच नहीं सकेगा। अगर प्रारब्धवश चोरी करनेसे धन मिल भी जाय तो भी उस धनका उपभोग नहीं हो सकेगा। वह धन बीमारीमें? चोरीमें? डाकेमें? मुकदमेमें? ठगाईमें चला जायगा। तात्पर्य यह है कि वह धन जितने दिन टिकनेवाला है? उतने ही दिन टिकेगा और फिर नष्ट हो जायगा। इतना ही नहीं? इन्कमटैक्स आदिकी चोरी करनेके जो संस्कार भीतर पड़े हैं? वे

संस्कार जन्मजन्मातरतक उसे चोरी करनेके लिये उकसाते रहेंगे और वह उनके कारण दण्ड पाता रहेगा।अगर धनका प्रारब्ध है तो कोई गोद ले लेगा अथवा मरता हुआ कोई व्यक्ति उसके नामसे वसीयतनामा लिख देगा अथवा मकान बनाते समय नींव खोदते ही जमीनमें गड़ा हुआ धन मिल जायगा? आदिआदि। इस प्रकार प्रारब्धके अनुसार जो धन मिलनेवाला है? वह किसीनकिसी कारणसे मिलेगा ही (टिप्पणी प0 892)। परन्तु मनुष्य प्रारब्धपर तो विश्वास करता नहीं?

कमसेकम अपने पुरुषार्थपर भी विश्वास नहीं करता कि हम मेहनतसे कमाकर खा लेंगे। इसी कारण उसकी चोरी आदि दुष्कर्मोंमें प्रवृत्ति हो जाती है? जिससे हृदयमें जलन रहती है? दूसरोंसे छिपाव करना पड़ता है? पकड़े जानेपर दण्ड पाना पड़ता है? आदिआदि। अगर मनुष्य विश्वास और सन्तोष रखे तो हृदयमें महान् शान्ति? आनन्द? प्रसन्नता रहती है तथा आनेवाला धन भी आ जाता है और जितना जीनेका प्रारब्ध है? उतनी जीवननिर्वाहकी सामग्री भी

किसीनकिसी तरह मिलती ही रहती है।जैसे व्यापारमें घाटा लगना? घरमें किसीकी मृत्यु होना? बिना कारण अपयश और अपमान होना आदि प्रतिकूल परिस्थितिको कोई भी नहीं चाहता? पर फिर भी वह आती ही है? ऐसे ही अनुकूल परिस्थिति भी आती ही है? उसको कोई रोक नहीं सकता। भागवतमें आया है -- सुखमैन्द्रियकं राजन् स्वर्गे नरक एव च। देहिनां यद् यथा दुःखं तस्मान्नेच्छेत तद् बुधः।।(श्रीमद्भा0 11। 8। 1)राजन् प्राणियोंको जैसे इच्छाके

बिना प्रारब्धानुसार दुःख प्राप्त होते हैं? ऐसे ही इन्द्रियजन्य सुख स्वर्गमें और नरकमें भी प्राप्त होते हैं। अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह उन सुखोंकी इच्छा न करे। जैसे धन और भोगका प्रारब्ध अलगअलग होता है अर्थात् किसीका धनका प्रारब्ध होता है और किसीका भोगका प्रारब्ध होता है? ऐसे ही धर्म और मोक्षका पुरुषार्थ भी अलगअलग होता है अर्थात् कोई धर्मके लिये पुरुषार्थ करता है और कोई मोक्षके लिये पुरुषार्थ

करता है। धर्मके अनुष्ठानमें शरीर? धन आदि वस्तुओँकी मुख्यता रहती है और मोक्षकी प्राप्तिमें भाव तथा विचारकी मुख्यता रहती है।एक करना होता है और एक होना होता है। दोनों विभाग अलगअलग हैं। करनेकी चीज है -- कर्तव्य और होनेकी चीज है -- फल। मनुष्यका कर्म करनेमें अधिकार है? फलमें नहीं -- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन (गीता 2। 47)। तात्पर्य यह है कि होनेकी पूर्ति प्रारब्धके अनुसार अवश्य होती है? उसके लिये

यह होना चाहिये और यह नहीं होना चाहिये -- ऐसी इच्छा नहीं करनी चाहिये और करनेमें शास्त्र तथा लोकमर्यादाके अनुसार कर्तव्यकर्म करना चाहिये। करना पुरुषार्थके अधीन है और होना प्रारब्धके अधीन है। इसलिये मनुष्य करनेमें स्वाधीन है और होनेमें पराधीन है। मनुष्यकी उन्नतिमें खास बात है -- करनेमें सावधान रहे और होनेमें प्रसन्न रहे। क्रियमाण? सञ्चित और प्रारब्ध -- तीनों कर्मोंसे मुक्त होनेका क्या उपाय हैप्रकृति

और पुरुष -- ये दो हैं। प्रकृति सदा क्रियाशील है? पर पुरुषमें कभी परिवर्तनरूप क्रिया नहीं होती। प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध माननेवाला प्रकृतिस्थ पुरुष ही कर्ताभोक्ता बनता है। जब वह प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेद कर लेता है अर्थात् अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है? तब उसपर कोई भी कर्म लागू नहीं होता।प्रारब्धसम्बन्धी अन्य बातें इस प्रकार हैं --(1) बोध हो जानेपर भी ज्ञानीका प्रारब्ध रहता है -- यह कथन केवल अज्ञानियोंको

समझानेमात्रके लिये है। कारण कि अनुकूल या प्रतिकूल घटनाका घट जाना ही प्रारब्ध है। प्राणीको सुखी या दुःखी करना प्रारब्धका काम नहीं है? प्रत्युत अज्ञानका काम है। अज्ञान मिटनेपर मनुष्य सुखीदुःखी नहीं होता। उसे केवल अनुकूलताप्रतिकूलताका ज्ञान होता है। ज्ञान होना दोषी नहीं है? प्रत्युत सुखदुःखरूप विकार होना दोषी है। इसलिये वास्तवमें ज्ञानीका प्रारब्ध नहीं होता।(2) जैसा प्रारब्ध होता है? वैसी बुद्धि बन जाती

है। जैसे? एक ही बाजारमें एक व्यापारी मालकी बिक्री कर देता है और एक व्यापारी माल खरीद लेता है। बादमें जब बाजारभाव तेज हो जाता है? तब बिक्री करनेवाले व्यापारीको नुकसान होता है तथा खरीदनेवाले व्यापारीको नफा होता है और जब बाजारभाव मन्दा हो जाता है? तब बिक्री करनेवाले व्यापारीको नफा होता है तथा खरीदनेवाले व्यापारीको नुकसान होता है। अतः खरीदने और बेचनेकी बुद्धि प्रारब्धसे बनती है अर्थात् नफा या नुकसानका

जैसा प्रारब्ध होता है? उसीके अनुसार पहले बुद्धि बन जाती है? जिससे प्रारब्धके अनुसार फल भुगताया जा सके। परन्तु खरीदने और बेचनेकी क्रिया न्याययुक्त की जाय अथवा अन्याययुक्त की जाय -- इसमें मनुष्य स्वतन्त्र है क्योंकि यह क्रियमाण (नया कर्म) है? प्रारब्ध नहीं।(3) एक आदमीके हाथसे गिलास गिरकर टूट गया तो यह उसकी असावधानी है या प्रारब्धकर्म करते समय तो सावधान रहना चाहिये? पर जो (अच्छा या बुरा) हो गया? उसे

पूरी तरहसे प्रारब्ध -- होनहार ही मानना चाहिये। उस समय जो यह कहते हैं कि यदि तू सावधानी रखता तो गिलास न टूटता -- इससे यह समझना चाहिये कि अब आगेसे मुझे सावधानी रखनी है कि दुबारा ऐसी गलती न हो जाय। वास्तवमें जो हो गया? उसे असावधानी न मानकर होनहार मानना चाहिये। इसलिये करनेमें सावधान और होनेमें प्रसन्न रहे। ,(4) प्रारब्धसे होनेवाले और कुपथ्यसे होनेवाले रागमें क्या फरक हैकुपथ्यजन्य रोग दवाईसे मिट सकता है

परन्तु प्रारब्धजन्य रोग दवाईसे नहीं मिटता। महामृत्युञ्जय आदिका जप और यज्ञयागादि अनुष्ठान करनेसे प्रारब्धजन्य रोग भी कट सकता है? अगर अनुष्ठान प्रबल हो तो।रोगके दो प्रकार हैं -- आधि (मानसिक रोग) और व्याधि (शारीरिक रोग)। आधिके भी दो भेद हैं -- एक तो शोक? चिन्ता आदि और दूसरा पागलपन। चिन्ता? शोक आदि तो अज्ञानसे होते हैं और पागलपन प्रारब्धसे होता है। अतः ज्ञान होनेपर चिन्ताशोकादि तो मिट जाते हैं? पर प्रारब्धके

अनुसार पागलपन हो सकता है। हाँ? पागलपन होनेपर भी ज्ञानीके द्वारा कोई अनुचित? शास्त्रनिषिद्ध क्रिया नहीं होती।(5) आकस्मिक मृत्यु और अकाल मृत्युमें क्या फरक है कोई व्यक्ति साँप काटनेसे मर जाय? अचानक ऊपरसे गिरकर मर जाय? पानीमें डूबकर मर जाय? हार्टफेल होनेसे मर जाय? किसी दुर्घटना आदिसे मर जाय? तो यह उसकी आकस्मिक मृत्यु है। स्वाभाविक मृत्युकी तरह आकस्मिक मृत्यु भी प्रारब्धके अनुसार (आयु पूरी होनेपर) होती

है।कोई व्यक्ति जानकर आत्महत्या कर ले अर्थात् फाँसी लगाकर? कुएँमें कूदकर? गाड़ीके नीचे आकर? छतसे कूदकर? जहर खाकर? शरीरमें आग लगाकर मर जाय? तो यह उसकी अकाल मृत्यु है। यह मृत्यु आयुके रहते हुए ही होती है। आत्महत्या करनेवालेको मनुष्यकी हत्याका पाप लगता है। अतः यह नया पापकर्म है? प्रारब्ध नहीं। मनुष्यशरीर परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है अतः उसको आत्महत्या करके नष्ट करना बड़ा भारी पाप है।कई बार आत्महत्या

करनेकी चेष्टा करनेपर भी मनुष्य बच जाता है? मरता नहीं। इसका कारण यह है कि उसका दूसरे मनुष्यके प्रारब्धके साथ सम्बन्ध जुड़ा हुआ रहता है अतः उसके प्रारब्धके कारण वह बच जाता है। जैसे? भविष्यमें किसीका पुत्र होनेवाला है और वह आत्महत्या करनेका प्रयास करे तो उस (आगे होनेवाले) लड़केका प्रारब्ध उसको मरने नहीं देगा। अगर उस व्यक्तिके द्वारा भविष्यमें कोई विशेष अच्छा काम होनेवाला हो? लोगोंका उपकार होनेवाला हो

अथवा इसी जन्ममें? इसी शरीरमें प्रारब्धका कोई उत्कट भोग (सुखदुःख) आनेवाला हो? तो आत्महत्याका प्रयास करनेपर भी वह मरेगा नहीं।(6) एक आदमीने दूसरे आदमीको मार दिया तो यह उसने पिछले जन्मके वैरका बदला लिया और मरनेवालेने पुराने कर्मोंका फल पाया? फिर मारनेवालेका क्या दोषमारनेवालेका दोष है। दण्ड देना शासकका काम है? सर्वसाधारणका नहीं। एक आदमीको दस बजे फाँसी मिलनी है। एकदूसरे आदमीने उस (फाँसीकी सजा पानेवाले)

आदमीको जल्लादोंके हाथोंसे छुड़ा लिया और ठीक दस बजे उसे कत्ल कर दिया ऐसी हालतमें उस कत्ल करनेवाले आदमीको भी फाँसी होगी कि यह आज्ञा तो राज्यने जल्लादोंको दी थी? पर तुम्हें किसने आज्ञा दी थीमारनेवालेको यह याद नहीं है कि मैं पूर्वजन्मका बदला ले रहा हूँ? फिर भी मारता है तो यह उसका दोष है। दूसरेको मारनेका अधिकार किसीको भी नहीं है। मरना कोई भी नहीं चाहता। दूसरेको मारना अपने विवेकका अनादर है। मनुष्यमात्रको

विवेकशक्ति प्राप्त है और उस विवेकके अनुसार अच्छे या बुरे कार्य करनेमें वह स्वतन्त्र है। अतः विवेकका अनादर करके दूसरेको मारना अथवा मारनेकी नीयत रखना दोष है।यदि पूर्वजन्मका बदला एकदूसरे ऐसे ही चुकाते रहें तो यह श्रृङ्खला कभी खत्म नहीं होगी और मनुष्य कभी मुक्त नहीं हो सकेगा। पिछले जन्मका बदला अन्य (साँप आदि) योनियोंमें लिया जा सकता है। मनुष्ययोनि बदला लेनेके लिये नहीं है। हाँ? यह हो सकता है कि पिछले

जन्मका हत्यारा व्यक्ति हमें स्वाभाविक ही अच्छा नहीं लगेगा? बुरा लगेगा। परन्तु बुरे लगनेवाले व्यक्तिसे द्वेष करना या उसे कष्ट देना दोष है क्योंकि यह नया कर्म है।जैसा प्रारब्ध है? उसीके अनुसार उसकी बुद्धि बन गयी? फिर दोष किस बातकाबुद्धिमें जो द्वेष है? उसके वशमें हो गया -- यह दोष है। उसे चाहिये कि वह उसके वशमें न होकर विवेकका आदर करे। गीता भी कहती है कि बुद्धिमें जो रागद्वेष रहते हैं (3। 40)? उनके वशमें

न हो -- तयोर्न वशमागच्छेत् (3। 34)।(7) प्रारब्ध और भगवत्कृपामें क्या अन्तर हैइस जीवको जो कुछ मिलता है? वह प्रारब्धके अनुसार मिलता है? पर प्रारब्धविधानके विधाता स्वयं भगवान् हैं। कारण कि कर्म जड होनेसे स्वतन्त्र फल नहीं दे सकते? वे तो भगवान्के विधानसे ही फल देते है। जैसे? एक आदमी किसीके खेतमें दिनभर काम करता है तो उसको शामके समय कामके अनुसार पैसे मिलते हैं? पर मिलते हैं खेतके मालिकसे।पैसे तो काम करनेसे

ही मिलते हैं? बिना काम किये पैसे मिलते हैं क्यापैसे तो काम करनेसे ही मिलते हैं? बिना काम किये पैसे पैसा देगा कौन यदि कोई जंगलमें जाकर दिनभर मेहनत करे तो क्या उसको पैसे मिल जायँगे नहीं मिल सकते। उसमें यह देखा जायगा कि किसके कहनेसे काम किया और किसकी जिम्मेवारी रही।अगर कोई नौकर कामको बड़ी तत्परता? चतुरता और उत्साहसे करता है? पर करता है केवल मालिककी प्रसन्नताके लिये तो मालिक उसको मजदूरीसे अधिक पैसे भी

दे देता है और तत्परता आदि गुणोंको देखकर उसको अपने खेतका हिस्सेदार भी बना देता है। ऐसे ही भगवान् मनुष्यको उसके कर्मोंके अनुसार फल देते हैं। अगर कोई मनुष्य भगवान्की आज्ञाके अनुसार? उन्हींकी प्रसन्नताके लिये सब कार्य करता है? उसे भगवान् दूसरोंकी अपेक्षा अधिक ही देते हैं परन्तु जो भगवान्के सर्वथा समर्पित होकर सब कार्य करता है? उस भक्तके भगवान् भी भक्त बन जाते हैं (टिप्पणी प0 894) संसारमें कोई भी नौकरको

अपना मालिक नहीं बनाता परन्तु भगवान् शरणागत भक्तको अपना मालिक बना लेते हैं। ऐसी उदारता केवल प्रभुमें ही है। ऐसे प्रभुके चरणोंकी शरण न होकर जो मनुष्य प्राकृत -- उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंके पराधीन रहते हैं? उनकी बुद्धि सर्वथा ही भ्रष्ट हो चुकी है। वे इस बातको समझ ही नहीं सकते कि हमारे सामने प्रत्यक्ष उत्पन्न और नष्ट होनेवाले पदार्थ हमें कहाँतक सहारा दे सकते हैं। सम्बन्ध --   जिस प्रकार कर्मयोगमें कर्मोंका अपने साथ सम्बन्ध नहीं रहता? ऐसे ही सांख्यसिद्धान्तमें भी कर्मोंका अपने साथ किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता -- इसका विवेचन आगे करते हैं।